इतिहास

गोण्डा जनपद उत्तर प्रदेश राज्य के पूर्वांचल में घाघरा नदी के उत्तर देवीपाटन मण्डल गोण्डा में स्थित है। जनपद के पूरब की सीमा पर जनपद बस्ती, पश्चिम में जनपद बहराईच उत्तर में जनपद बलरामपुर तथा दक्षिण में फैजाबाद व बाराबंकी जनपद स्थित है। विश्व के मानचित्र में जनपद गोण्डा 26.41 से 27.51 डिग्री उत्तरी अक्षांश तथा 81.30 से 82.06 पूर्वी देशान्तर के मध्य में अवस्थित है।

जनपद का कुल क्षेत्रफल 4003 वर्ग कि0मी0 है जो देवीपाटन मण्डल के कुल क्षेत्रफल का 28.13 प्रतिशत है। इस जनपद में 04 तहसीलें गोण्डा, मनकापुर, करनैलगंज एवं तरबगंज है। इन तहसीलों में तहसील गोण्डा का क्षेत्रफल 1249.48 वर्ग कि0मी0, तहसील मनकापुर का 763.70 वर्ग कि0मी0, तरबगंज का 963.31 वर्ग कि0मी0 व करनैलगंज का 1026.51 वर्ग कि0मी0 है। इस प्रकार जनपद गोण्डा के कुल क्षेत्रफल का 31.21 प्रतिशत तहसील गोण्डा, 19.07 प्रतिशत तहसील मनकापुर, 24.06 प्रतिशत तहसील तरबगंज व 25.64 प्रतिशत तहसील करनैलगंज का क्षेत्रफल है।

जनपद में बाराही देवी, खैराभवानी तथा शंकर जी दःुखहरन नाथ एवं पृथ्वीनाथ मंदिर अपनी धरोहर दीर्घकाल से संजोये हुये है। जनपद पूर्वी जनपदों से काफी पिछड़े जनपद में आता है। तहसील करनैलगंज व तरबगंज सरयू, घाघरा की तलहटी में बसा है, यही कारण है कि इस क्षेत्र में बाढ़ एवं सूखे की बराबर सम्भावना बनी रहती है। फिर भी प्राकृतिक दृष्टि से यह क्षेत्र उपजाऊ है।

जनपद अपने एतिहासिक गौरव को संजोये हुये है। भारत की स्वतंत्रता आन्दोलन में यह जनपद अग्रहणी रहा है। यहाँ के राजा देवीबक्श सिंह एक वीर योद्धा व देशभक्त राजा थे जिन्हों स्वतंत्रता आन्दोलन में अंग्रेजों के साथ लड़ते-लड़ते अपने जीवन को एवं अपने परिवार को न्योछावर कर दिया। उनका बनवाया हुआ सागर तालाब आज भी नगर की शोभा बड़ा रहा है।
जनपद में घाघरा, सरयू एवं कुआनो तीन प्रवाहिनी नदियाँ हैं। इसके अतिरिक्त बिसुही, मनवर व टेढ़ी मौसमी नदियाँ हैं। घाघरा नदी जनपद की दक्षिणी सीमा बनाती हुयी पश्चिम से पूर्व की ओर बहती है। सरयू नदी जनपद के दक्षिण पश्चिम दिशा से विकास खण्ड करनैगंज में प्रवेश करती हुयी पसका के पास घाघरा नदी में मिल जाती है। यह सरयू का ऊपरी मैदान के अन्तर्गत गोनार्द आता है। गोनार्द जहाँ गायें कुलेल करती हैं-गावः नर्दन्ति यत्र तत्र गोनर्दम का उल्लेख कई जगह आया है। पाणिनी की अष्टाध्यायी पर महाभाष्य लिखने वाले महर्षि पतांजलि अपने को गोनार्दीय लिखते हैं। ‘कामसूत्र’ में भी गोनार्दीय मत का उल्लेख किया गया है। यह क्षेत्र वनों से अच्छादित था। कहा जाता है कि कौशल राजा की यह गोचर भूमि थी। इक्ष्वाकुवंशीय राजा दिलीप ने इसी क्षेत्र में नन्दिनी की सेवा की थी। वशिष्ठ ऋषि का आश्रम इसी क्षेत्र में था। अयोध्या के नजदीक होने के कारण ऋषि मुनियों का आवागमन एवं तप करने का स्थान यह क्षेत्र रहा है।